...अलगाव

प्रेम में अलगाव का घाव जितना गहरा होता है उतना ही पीड़ादायी। इसके लिए हर हवा पूरबा होती है। बीतते दिन के साथ यह नासूर होता जाता है।पीडित इंसान उस जख्म का भी आदी हो जाता है। वह उससे उबरना तो चाहता है लेकिन साथ की यादें उसे रोज कुरेद देती हैं। आखिर में इंसान उस जख्म से ही प्यार करने लगता है। उसकी यादों की तरह उसकी पीड़ा भी अपनी सी लगने लगती है। बशर्ते प्रेम दैहिक, भौतिक और सांसारिक सुख से इतर वाला हो।

विद्या वाली देवी सरस्वती जी की पूजा वाले दिन उनकी आंखें पहली दफा चार हुई थी। धागे पर पताका लगाते-लगाते कब वह उसके दिल पर अपना ठप्पा लगा गई थी लड़के को भी समझने में एक अरसा लगा था। ठप्पे का रंग रोज दर रोज गहरा होता गया। दिन, सप्ताह, महीने साल बीत गए तब उसे इसका भान हुआ था उसे प्यार हो गया है। झूठ तो उसकी फितरत ही नहीं थी। प्रेम में फरेब कहां करता। कई बंदिशों के बाद भी उसने स्वीकार लिया कि वह उसके हाथ से गूंथे आटे की रोटी जीवन भर खाना चाहता है। उसे दफ्तर तक छोड़ने की जिम्मेदारी भी उठाने के लिए वह तैयार हो गया था। और इस तरह दोनों के प्यार का सफर शुरू हो गया।

लड़के के जन्मदिन के रोज वह अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर उसके शहर पहुंची थी। उसे एकांत पसंद था। उसकी खुशी के लिए रेस्त्रां की तैयारी को दरकिनार कर पार्क में इस लम्हे को जीने पहुंच गई। दोस्तों द्वारा उसके मुंह पर सने केक को अपने महंगे दुपट्टे से इस बेपरवाही से पोछ रही थी कि अगर कोई उसे गंदे दुपट्टे के बारे में पूछे तब बता देगी उसकी सूरत से कहां महंगा है इसकी सफाई। चंद सेकेंड ही सही अकेलापन मिलते ही उसके कंधे पर सर रखकर झूला यूं झुलने लगी जैसे उम्र भर की सारी खुशियां उसे उसकी बाहों में मिल गई हो।

तोहफे में टाइटन की घड़ी दी थी। कलाई पर ऐसे बांध रही थी मानों अपने सुख की हर घड़ी उसकी कलाई के नाम कर दे रही हो। कम से कम दर्जन बार तो उसके कलाई को निहारी होगी, कि सही तो लग रही है उनके काले हाथ पर स्टील के चेन की यह घड़ी। डायल का आकार सूट तो कर रहा है उसके दुबले हाथ को। पहले हाथ को निहारती फिर उसके इतराते चेहरे को।

दोनों अमूमन शहर के लाल टेबल क्लॉथ वाले रेस्त्रां में ही मिलते थे। एक तरह से शहर में वह उनका मीटिंग प्वाइंट टाइप हुआ करता था। लड़का बस उसके साथ को जीना चाहता था। थोड़ी शर्म भी आती होगी। लड़की इसके उलट उसके साथ बीताए हर लम्हे को अपने अपने रंग-बिरंगे कवर वाले मोबाइल में कैद कर लेना चाहती थी। टेबल पर वह दूर हटता जाता था वह उसके पास आती जाती थी। लड़की की यही तो एक शिकायत थी। देखिए न ये एकदम रोमांटिक नहीं है। कभी साथ में फोटो नहीं खिंचाता है। लड़की इस बात से अंजान था कि लड़का अपना कितना कीमती वक्त उसके लिए निकाला करता था।

खुशियां समाज को कहां रास आई है। वक्त विलेन बना। करवट लिया। क्या हुआ उसे शंकर महादेवन के इस नग्मे से समझने की कोशिश कीजिए।

कोई जो मिला तो मुझे ऐसा लगता था

जैसे मेरी सारी दुनिया में गीतों कीरुत

और रंगों की बरखा है

शुशबू की आंधी है

महकी हुई सी अब सारी फिजाएं हैं

खोयी हुई सी अब सारी दिशाएं हैं

बदली हुई सी अब सारी अदाएं हैं....

वो जो कभी आया था, नजरों में छाया था

दिल में समाया था, जा भी चुका है

और दिल मेरा अब तनहा तनहा

न तो कोई अरमान है, न कोई तमन्ना है

और  न कोई सपना है...।

 

लड़का इन दिनों इस नगमें में डूबा रहता है। इस नगमे के साथ कहानी भी समाप्त हो गई। मेरी भी और उनकी भी।

  

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